मुझे कल रात को ही एक भाई की कॉल आई , साधना की जिज्ञासा के सन्दर्भ में जब उन भाई जी ने बताया तो उनका कहना था कि "पिछले 7 वर्षों से वह आध्यात्मिक विधाओं के प्रति सतत निरंतर अभ्यास रत होते हुए भी उसको अभी तक कोई विशेष अनुभूति नहीं हुई है ।
अक्सर ये हाल बहुत से जिज्ञासुओं का है जो कहते हौं कि बहुत से सिद्ध पंडित से मिल लिए ,बहुत से विधान कर लिए लेकिन अनुभूति के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं हुआ ।
ऐसे जिज्ञासु साधकों के लिए मैं कुछ स्वानुभूत अनुभव बताना चाहूंगा ।
जरुरी नहीं कि मेरे यह अनुभव आपको सही मार्ग पर ले चलें लेकिन हो सकता है आप भी इन्ही किसी अनुभव के आधार पर अपनी गलती सुधार सकें।
1. एक इष्ट की उपासना करें ।
अक्सर भटकाव का मुख्य कारण यही होता है कि साधना और अध्यात्म मार्ग पर नयन साधक बहुत जल्दी अपने आस पास के अन्य साधकों अथवा किसी अमुक देवी देवता की क्षमताओं का वर्णन सुन कर उसी देवी देवता अथवा साधक की देखा देखी में हर समय अपना इष्ट बदलते रहता है । 2 -4 दिन दुर्गा को पूजा फिर शिव को , कभी काली को , कभी किसी को तो कभी किसी को । और ऐसा करते करते जब अनुभूति नहीं होती है तो साधक विचलित होने लगता है ।
एक बात हमेशा ध्यान रखिए कि जो व्यक्ति बार बार सिम बदलता है उसे विश्वसनीय नहीं कहा जाता है । ऐसे ही साधना और अध्यात्म में भी यही नियम लागू होता है । साधना मार्ग में कदम रखने से पहले अपनी अंतरात्मा से यह निश्चित कर लें कि कौन से देवता के प्रति आपके हृदय में सर्वाधिक सम्मान है ।
याद रखिए , साधना के अंतिम पड़ाव में शक्ति सिर्फ और सिर्फ 1 है । अतः प्रारम्भ भी एक इष्ट से कीजिये और यकीन मानिए कि एक इश्वर की निरंतर साधना करते रहने से आपको वही एक देवता आपको समस्त सिद्धियां देने में सक्षम हो जायेगा जो भी एक जीवन में आप सोचते हैं ।
2. रोज का एक नियम बनाकर साधना करें ।
अक्सर हम साधना मार्ग में जल्दी जल्दी ही सब कुछ प्राप्त करना चाहते हैं । कोई 11 दिन कोई 21 दिन की साधना के नाम पर बैठ कर जब अंत में कुछ हाथ नहीं लगता है तो वह विचलित हो उठता है ।
मित्रों , साधना और सिद्धि कोई हलवा नहीं है जो 21 दिन या 31 दिन में सिद्ध हो जाये । साधना एक सतत निरंतर चलने वाली रूपांतरण की प्रक्रिया है । और इस प्रक्रिया में सबसे आवश्यक है कि अपना एक नियम बाँध लें कि एक निश्चित समय में आप सारे काम छिड़ कर अपने इष्ट के सम्मुख बैठ कर उनसे संबंधित मन्त्र , जप , कवच , स्तोत्र का नियमित रोज पाठ करें ।
जितना आपका धैर्य प्रगाढ़ होता जाएगा आपको प्रत्येक सिद्धि चरणबद्ध रूप से मिलने लग जाएगी ।
3. स्वयं को पढ़ने का प्रयास करें ।
हम अक्सर दुसरे व्यक्तित्व को देख कर या तो प्रभावित होते हैं अथवा निराश होते हैं और लगभग सम्पूर्ण जीवन हमारा या तो किसी के प्रभाव में बीत जाता है अथवा किसी को देख कर निराशा में बीत जाता है ।
एक साधक का पहला काम यही होना चाहिए कि वह रोज अपने को देखे , अपने व्यक्तित्व को बेहतर बनाने के सम्पूर्ण प्रयास करे । याद रखिए मित्रों , जितना हम स्वयं के नजदीक जाते हैं उतना ही हम अस्तित्व के करीब जाते हैं ।
4. सजग होकर सहज रहने का प्रयास करें ।
सजगता का सीधा अर्थ है कपट क्षल रहित चरित्र का निर्माण करें और आ जैसे भी हैं स्वयम को प्रेम करना सीखें , यहीं प्रेम सहजता में बदलने लगेगा ।
सहजता और सजगता को बढ़ाने का सबसे सरल उपाय है कि अपने इष्ट के सम्मुख बैठ कर , जो भी आपको इस जीवन में मिला है उसके लोए परमेश्वर का धन्यवाद करें , और उसकी कृपा के आकांक्षी हो कर उस परमात्मा को अपने भीतर महसूस करें ।
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